Sun. Aug 9th, 2026

*✨मानस कथाव्यास, संत श्री मुरलीधर जी की अमृतमयी ज्ञानधारा में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य*

*🌳विश्व आदिवासी दिवस पर जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में जनजातीय समुदायों के योगदान को परमार्थ निकेतन से किया नमन*

*✨अगस्त क्रांति दिवस पर अमर स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत का दिया संदेश*

*💥अगस्त क्रांति दिवस पर स्वाधीनता के अमर सेनानियों को नमन*

*🌳आदिवासी समुदाय, प्रकृति के प्रहरी, परंपरा के संवाहक*

*🙏🏻स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

वृन्दावन, 9 अगस्त। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का वृन्दावन धाम में संत श्री मुरलीधर जी के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही श्रीराम कथा रूपी अमृतमयी ज्ञानधारा में पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। आध्यात्मिकता, संस्कृति, प्रकृति और राष्ट्रसेवा के विभिन्न आयामों को जोड़ते हुए पूज्य स्वामी जी ने विश्व आदिवासी दिवस तथा अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर अत्यंत भावपूर्ण संदेश दिया।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की जनजातीय परंपराएँ, हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भारतीय जीवन-दृष्टि की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। पीढ़ियों से आदिवासी समुदायों ने जल, जंगल और जमीन को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार भी है।

उन्होंने कहा कि जंगलों की रक्षा, जलस्रोतों का संरक्षण, जैव-विविधता की सुरक्षा और धरती के प्रति श्रद्धा, इन सबमें जनजातीय समाज ने पूरी दुनिया को बहुत कुछ सिखाया है। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति हमारी संपत्ति नहीं, हमारी धरोहर है, पृथ्वी पर हमारा अधिकार नहीं, बल्कि वह हमारी जिम्मेदारी है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आदिवासी समाज की सरलता, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, सामुदायिक जीवन, ज्ञान, कला, परंपराएँ और सांस्कृतिक विविधता भारत की आत्मा को समृद्ध करती हैं। हमें आदिवासी संस्कृति को केवल देखने या जानने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उससे प्रकृति के प्रति संवेदना, संरक्षण और सह-अस्तित्व की प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।

अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले सभी अमर स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया।

उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी जी के आह्वान पर प्रारंभ हुआ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह ऐतिहासिक अध्याय है, जिसने देशवासियों में एकता, साहस और स्वतंत्रता की प्रबल चेतना जागृत की। ‘करो या मरो’ का संकल्प उस समय भारत की सामूहिक शक्ति, अदम्य साहस और स्वतंत्रता के प्रति अटूट संकल्प का प्रतीक बना।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि स्वतंत्रता हमें असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों के त्याग, तपस्या, संघर्ष और बलिदान से प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि आजादी के अमृत संकल्प को आगे बढ़ाते हुए हमें स्वदेशी को अपनाने, स्थानीय प्रतिभा और संसाधनों को प्रोत्साहित करने, आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में योगदान देने तथा विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी और समर्पण से कार्य करना होगा।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा हमें संदेश देती है कि राष्ट्रसेवा, समाजसेवा और प्रकृति सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जिस धरती ने हमें जीवन दिया, जिस जल ने मानवता को सींचा, जिन वनों ने हमारी सभ्यता को पोषित किया और जिन महान विभूतियों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित किया, उन सभी के प्रति कृतज्ञता हमारा नैतिक दायित्व है।

उन्होंने आह्वान किया कि आज के दिन हम दो संकल्प लें, आदिवासी गौरव और संस्कृति का सम्मान करें तथा जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संकल्प लें, साथ ही अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता, एकता और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए अपना योगदान दें।

वृन्दावन धाम की पावन भूमि से पूज्य स्वामी जी ने संदेश दिया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, उसकी जड़ों में है, उसकी प्रकृति में है और उसकी सनातन संस्कृति में है। जब हम अपनी जड़ों, अपनी प्रकृति, अपने जनजातीय समाज और अपने राष्ट्र के गौरव का सम्मान करेंगे, तभी एक सशक्त, समृद्ध, संवेदनशील और विकसित भारत का निर्माण होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *