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परमार्थ निकेतन में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी एवं कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एवं डीन शिवानी वी. जी का आगमन एवं पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से दिव्य भेंट
संस्कृत शिक्षा के विस्तार पर परमार्थ निकेतन में महत्वपूर्ण चर्चा
परमार्थ निकेतन में संस्कृत गुरुकुल एवं डिजिटल शिक्षा को लेकर हुआ मंथन
संस्कृत भाषा के विस्तार एवं कन्या गुरुकुल स्थापना पर परमार्थ निकेतन में प्रेरणादायी चर्चा
ऋषिकेश, 6 मई। परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी जी तथा उनकी धर्मपत्नी एवं कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एवं डीन प्रो. शिवानी वी. जी दर्शनार्थ आये। दोनों विद्वान शिक्षाविदों ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति और शिक्षा के विविध महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत एवं सारगर्भित चर्चा की।
इस अवसर पर मुख्य रूप से संस्कृत गुरूकुलों के पुनरुत्थान, कन्या गुरूकुलों की स्थापना, संस्कृत भाषा के व्यापक विस्तार तथा डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से संस्कृत को अधिक सुलभ बनाने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान यह भी चर्चा हुई कि किस प्रकार आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का समन्वय कर भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित किया जा सकता है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने इस अवसर पर विशेष रूप से कन्या गुरूकुल की स्थापना हेतु प्रेरित करते हुये कहा कि मातृ शक्ति ही संस्कारों की प्रथम वाहक होती है। यदि माँ संस्कारी है तो परिवार संस्कारी होगा और जब परिवार संस्कारी होगा तो समाज और राष्ट्र स्वतः ही संस्कारवान बनेगा। उन्होंने यह भी कहा कि “देवी स्वस्थ तो देश स्वस्थ” इसलिए बालिकाओं की शिक्षा केवल शिक्षा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि कन्याओं के लिए विशेष रूप से आयुर्वेदिक गुरूकुलों की स्थापना की जाए, जहाँ वे न केवल संस्कृत और वेदों का अध्ययन करें, बल्कि आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और जीवन विज्ञान के माध्यम से स्वस्थ जीवन शैली को भी आत्मसात करें। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ, संस्कारी और आत्मनिर्भर बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगी।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है, जो मानवता को जोड़ने और जीवन को ऊँचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखती है। संस्कृत शिक्षा को आधुनिक तकनीक से जोड़कर अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँचाया जाएगा, जिससे भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी सहजता से आत्मसात कर सके। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना, शिक्षा और अध्यात्म के पुनर्जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक कदम है।
पूज्य स्वामी जी और पूज्य भाईश्री जी के पावन सान्निध्य में परमार्थ निकेतन की विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती में सभी अतिथियों ने सहभाग किया। यात्रा की स्मृति स्वरूप पूज्य स्वामी जी ने रुद्राक्ष का पौधा भेंट किया।

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