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‎नई टिहरी, विकासखंड जौनपुर के अंतर्गत तहसील नैनबाग की पट्टी ईडवालस्यूँ स्थित प्राचीन देवस्थल देवीथात में श्रावण मास की 15 गते आयोजित होने वाला गोठी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोकआस्था, सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी देव परंपरा का जीवंत प्रतीक है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को इस वर्ष भी स्थानीय लोगों ने पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया। क्षेत्र में इस मेले के साथ ही पर्व-त्योहारों के शुभारंभ की मान्यता भी जुड़ी हुई है।

‎लोकमान्यताओं के अनुसार प्राचीन देवस्थल देवीथात में माँ गौरजा का दिव्य निवास है, जबकि भगवान नागराज अपनी बहन माँ गौरजा से मिलने वर्ष में दो बार—बैसाख मास की द्वितीया तथा भाद्रपद में जन्माष्टमी के उपरांत—अपने सिद्धधाम नागटिब्बा से दिव्य घोड़ी पर सवार होकर यहां पहुंचते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि पूर्वकाल में कई लोगों को इस दिव्य मिलन के दर्शन हुए थे। आज भी यह दिव्य परंपरा निरंतर जारी है, लेकिन इसके दर्शन किसी को नहीं हो पाते। यही आस्था इस देवस्थल को क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
‎गोठी मेले की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि क्षेत्र के ग्वाल-बाल बुग्याल में मिट्टी से भगवान नागदेवता का स्वरूप निर्मित कर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजते हैं। इसके उपरांत केदार पाती, दही, मक्खन, धूप, दीप, पुष्प एवं प्रसाद अर्पित कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, उत्तम कृषि, पशुधन की उन्नति और समस्त जनमानस के मंगल की कामना की जाती है। सदियों से चली आ रही यह लोक परंपरा आज भी उसी श्रद्धा, विश्वास और आत्मीयता के साथ निभाई जा रही है, जो इस मेले को उत्तराखंड की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय प्रतीक बनाती है।
‎पूर्व सैनिक एवं ग्राम प्रधान भटवाड़ी सुनील सेमवाल ने बताया कि इस वर्ष यह मेला 31 जुलाई को गोठी मेले का आयोजन पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया गया। मेले में पट्टी ईडवालस्यूँ, जौनपुर क्षेत्र तथा दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर माँ गौरजा और भगवान नागराज के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि अपनी अनूठी लोक परंपराओं, धार्मिक आस्था और सामाजिक समरसता के कारण यह मेला वर्षों से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है तथा नई पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर इसमें भागीदारी निभा रही है।
‎प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी देवीथात का महत्व अत्यंत विशिष्ट है। यहां से भगवान नागराज के सिद्धधाम नागटिब्बा और कोट श्रीकोट के दिव्य दर्शन होते हैं। देवदार, बांज और बुरांश के घने जंगलों से घिरा यह देवस्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति के साथ हिमालयी प्रकृति की अनुपम छटा का भी साक्षी बनाता है।
‎‎बदलते समय के साथ आधुनिकता का प्रभाव भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन देवीथात का गोठी मेला आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोकसंस्कृति और देव परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बना हुआ है। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है, जिसे स्थानीय समाज ने सदियों से अपनी आस्था, परंपराओं और सामूहिक सहभागिता के बल पर आज तक सुरक्षित रखा है।

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