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*अंतर्राष्ट्रीय आशा दिवस पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज का संदेश-आशा के बिना शांति नहीं, विश्वास के बिना विकास नहीं और शान्ति व विकास के बिना भविष्य नहीं*

*भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही मानवता को यह संदेश दिया था कि तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ो। यही आशा का वास्तविक स्वरूप*

*आशा, मानवता के नवजागरण, वैश्विक शांति और सतत भविष्य का आधार*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश, 12 जुलाई। अंतर्राष्ट्रीय आशा दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने समस्त मानवता को आशा, विश्वास, करुणा और सेवा का संदेश देते हुए कहा कि आज जब विश्व युद्धों, हिंसा, मानसिक तनाव, सामाजिक असमानताओं, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकटों जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब आशा केवल एक सकारात्मक भावना नहीं, बल्कि मानव चेतना को दिशा देने वाली दिव्य शक्ति है। यही शक्ति हमें निराशा से निकालकर उद्देश्यपूर्ण जीवन, समाज को विभाजन से निकालकर समरसता और विश्व को संघर्ष से निकालकर शांति की ओर ले जाती है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा, आशा के बिना शांति नहीं, विश्वास के बिना विकास नहीं, और शान्ति व विकास के बिना भविष्य नहीं यह सनातन जीवन-दर्शन और मानव सभ्यता का शाश्वत सत्य है। आशा, विश्वास और परस्पर आस्था ऐसे तीन दिव्य स्तंभ हैं जिन पर व्यक्ति का चरित्र, समाज की संस्कृति और विश्व का भविष्य निर्मित होता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही मानवता को यह संदेश दिया था कि तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ो। यही आशा का वास्तविक स्वरूप है। आशा वह आंतरिक प्रकाश है जो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देता है। महामारी, प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध और मानवीय संकट यह सिद्ध करते हैं कि मानवता का अस्तित्व केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि आशा, सहयोग और करुणा से सुरक्षित रहता है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि केवल आशा पर्याप्त नहीं है; आशा को विश्वास का आधार और सेवा का स्वरूप मिलना चाहिए। विश्वास ही परिवारों को जोड़ता है, समाज में सहयोग को बढ़ाता है और राष्ट्रों के बीच शांति एवं साझेदारी का मार्ग प्रशस्त करता है। जहाँ विश्वास समाप्त होता है, वहाँ भय, हिंसा और विभाजन जन्म लेते हैं। इसलिए आज विश्व को हथियारों से अधिक विश्वास, प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग और उपभोग से अधिक करुणा की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति का मूल संदेश वसुधैव कुटुम्बकम् आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। जब सम्पूर्ण पृथ्वी को एक परिवार माना जाएगा, तभी मानवता जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति और सीमाओं से ऊपर उठकर साझा भविष्य का निर्माण कर सकेगी। यदि हम एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयात्री मानें, तो संघर्ष संवाद में और विभाजन सहयोग में परिवर्तित हो सकता है।

पूज्य स्वामी जी ने विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज भौतिक सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ मानसिक तनाव, अकेलापन, अवसाद और जीवन के प्रति निराशा भी बढ़ रही है। आधुनिक जीवन ने साधन तो दिए हैं, किन्तु साधना से दूरी भी बढ़ा दी है। योग, ध्यान, प्रार्थना, सत्संग, सेवा और प्रकृति के साथ पुनः जुड़ना ही मन की शांति और आंतरिक संतुलन का वास्तविक मार्ग है। जब मन आशा से भरता है, तब जीवन में उद्देश्य, ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार होता है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि पृथ्वी के भविष्य के प्रति आशा तभी सार्थक होगी जब हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँ। नदियाँ, वन, पर्वत, जल, वायु और जैव विविधता केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत हैं। परमार्थ निकेतन द्वारा संचालित स्वच्छ गंगा अभियान, वृक्षारोपण, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली, जल संरक्षण, जैविक जीवनशैली और पर्यावरण जागरूकता अभियान इसी विश्वास पर आधारित हैं कि प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है। जब हम पृथ्वी की सेवा करते हैं, तब हम आने वाली पीढ़ियों के लिए आशा का बीजारोपण करते हैं।

पूज्य स्वामी जी ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में आशा के दूत बनें। आशा भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि भविष्य का निर्माण करती है। विश्वास उस निर्माण को स्थायित्व देता है और एक-दूसरे पर आस्था उसे शांति, समृद्धि और मानवता के उज्ज्वल कल में परिवर्तित कर देती है। आइए, हम अपने भीतर आशा का दीप प्रज्वलित करें, अपने जीवन को सेवा का माध्यम बनाएँ और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ ऐसा विश्व निर्मित करें जहाँ प्रत्येक प्राणी सम्मान, करुणा, सुरक्षा और शांति के साथ जीवन जी सके। यही सनातन संस्कृति का संदेश है और यही आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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