Fri. Feb 27th, 2026

परमार्थ त्रिवेणी पुष्प, प्रयागराज में भगवान श्री जगन्नाथ जी प्राण-प्रतिष्ठा पूर्णाहुति समारोह संपन्न*

परमार्थ त्रिवेणी पुष्प, प्रयागराज भगवान श्री जगन्नाथ जी प्राण प्रतिष्ठा पूर्णाहुति के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने ऋषिकन्याओं द्वारा संगम आरती करने और कन्या गुरूकुल खोलने का किया आह्वान*

प्रयागराज के लगभग सभी मठोेेें, अखाड़ों, मन्दिरों व आश्रमों के पूज्य संत और भगवान श्री जगन्नाथ धाम पुरी के प्रमुख आचार्य श्री मधुसूदन जी का पावन सान्निध्य व आशीर्वाद*

हाइकोर्ट के माननीय न्यायधीश, शिक्षाविद्, उच्चाधिकारी, समाज सेवी, उद्योगतियों की गरिमामयी उपस्थिति*

संगम के हर घाट पर आरती हो, साप्ताहिक श्रमदान के माध्यम से घाटों को स्वच्छ रखने का किया आह्वान*

संगम के तट से आपसी संगम बनाये रखने का किया आह्वान*

स्वच्छता बाहर और स्वच्छता भीतर*

स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

प्रयागराज। तीर्थराज प्रयागराज के पावन संगम तट पर स्थित परमार्थ त्रिवेणी पुष्प परिसर में भगवान श्री जगन्नाथ जी के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की दिव्य पूर्णाहुति अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ सम्पन्न हुई। इस ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, अध्यक्ष परमार्थ निकेतन, के सान्निध्य में संत समाज, शिक्षाविदों, न्यायविदों, उच्चाधिकारियों, उद्योगपतियों तथा सैकड़ों श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।

समारोह में भगवान श्री जगन्नाथ धाम पुरी से पधारे प्रमुख आचार्य श्री मधुसूदन जी सहित प्रयागराज के लगभग सभी मठों, अखाड़ों, मंदिरों एवं आश्रमों के पूज्य संतों ने अपनी पावन उपस्थिति से आयोजन को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया। वैदिक मंत्रोच्चार, हवन, यज्ञ और पूर्णाहुति के साथ सम्पूर्ण वातावरण भक्ति और दिव्यता से ओतप्रोत हो उठा।

इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में कहा कि “प्राण-प्रतिष्ठा अर्थात् अपने हृदय में ईश्वर की चेतना जगाने का संकल्प है। जब तक हमारे भीतर संस्कार, सेवा और सद्भाव की प्रतिष्ठा नहीं होगी, तब तक समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।

उन्होंने विशेष रूप से ऋषिकन्याओं द्वारा संगम आरती की परंपरा प्रारंभ करने का आह्वान करते हुए कहा कि हमारी बेटियाँ केवल परिवार की शक्ति नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्र की आधारशिला हैं। संगम तट, न्यू अरैल घाट पर ऋषिकन्याओं द्वारा नियमित आरती भारतीय संस्कृति की गरिमा, नारी शक्ति और आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रतीक बनेगी। इसी क्रम में उन्होंने कन्या गुरूकुल खोलने की घोषणा की, जहाँ बालिकाओं को वेद, संस्कृत, योग, ध्यान, भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक शिक्षा का समन्वित प्रशिक्षण दिया जाएगा।

स्वामी जी ने कहा कि “नारी शिक्षित होगी तो राष्ट्र सशक्त होगा। कन्या गुरूकुल भारत की उस प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करेगा, जहाँ ज्ञान, संस्कार और सेवा का संगम होता था। भारत की अन्य भाषाओं में भी कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण उन कन्याओं को दिया जायेगा ताकि वे संस्कारों व संस्कृति की अलख जगा सके।

उन्होंने संगम की पवित्रता और स्वच्छता बनाये रखने पर विशेष बल देते हुए उपस्थित जनसमूह से आग्रह किया कि “संगम के हर घाट पर आरती हो और प्रत्येक सप्ताह श्रमदान के माध्यम से घाटों की सफाई की जाए। स्वच्छता केवल बाहरी नहीं, भीतरी भी होनी चाहिए। जब तक मन स्वच्छ नहीं होगा, तब तक समाज भी स्वच्छ नहीं बन सकता।”

“स्वच्छता बाहर और स्वच्छता भीतर” का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे हम गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम को निर्मल रखना चाहते हैं, वैसे ही अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों को भी निर्मल रखना होगा। पर्यावरण संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त घाट, सामूहिक श्रमदान और जन-जागरूकता के माध्यम से ही संगम की पवित्रता को बनाए रखा जा सकता है और इसमें मठों, आश्रमों और अखाड़़ों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

उन्होंने संगम की आध्यात्मिकता को सामाजिक एकता से जोड़ते हुए कहा, “यह केवल नदियों का संगम नहीं, बल्कि हृदयों का संगम है। हमें जाति, भाषा, क्षेत्र और मतभेदों से ऊपर उठकर आपसी प्रेम, सहयोग और सद्भाव का संगम बनाना है क्योंकि जब समाज एकजुट होगा, तभी राष्ट्र मजबूत होगा।”

अंत में स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि “आइए, हम सब मिलकर संगम से सेवा, संस्कार और समर्पण की ज्योति प्रज्वलित करें। अपने भीतर की नकारात्मकता को जलाकर सकारात्मकता, करुणा और राष्ट्रप्रेम का दीप जलाएँ। यही सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा है।

स्वामी जी ने इस पूरे आयोजन के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने के लिये श्री विनोद बागरोडिया जी, श्री रजत बागरोडिया जी, श्रीमती उपासना बागरोडिया, श्रीमती आभा बागरोडिया, आभा बागरोडिया ट्रस्ट, श्री अरूण सारस्वत जी, आचार्य दीपक शर्मा, रेखा मशरूवाला, अतुल मशरूवाला, माधव, आचार्य दीलिप, संतोष गुप्ता, संतोष पाण्डेय, शिव, अन्जना, समस्त ऋषिकुमार, पुरी से महाप्रसाद बनाने आये महाराज, समस्त पुरोहितगण और सभी का अभिनन्दन कर सम्मानित किया।

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